Thursday, March 11, 2010

इंसानियत का ज़नाजा...

--> आज कल जब भी अखबारों में दंगो की खबरे आती है,
तो दिल उदास हो जाता है!अक्सर मन में ये सवाल
उठता है की इन्सान इतना नासमझ कैसे हो सकता है
जो जाति,धर्म के नाम पर अपनों का ही खून बहाए!
मेरा ये दर्द आज मेरी कलम से निकला है!
शायद , आप लोगो को पसंद आये!





आज हम सभ्य और सुजान बन गए,
आधे हिन्दू आधे मुस्लमान बन गए,
अब भी रगों में बहता लहू का रंग तो एक है,
फिर क्यों आज धर्म ही हमारी पहचान बन गए ?

किसने देखा है भगवान को?
किसने ख़ुदा का दीदार किया है?
बस पंडितो और मौलवियों की जुबान पर,
आज राम और रहीम के मकान बन गए!

इंसानियत के प्यार भरे गुलशन में,
रंजिशो और साजिशो के गुलदान लग गए !
गैर मजहबी सीने में खंजर उतारना,
आज धर्मपरस्तो के ईमान बन गए!

साथ साथ देखे थे हमने, जंग- आज़ादी के धूप-छाँव!
अंग्रेजी गोलियों ने भी नहीं किया,हमारे सीनों में भेदभाव!
तो फिर क्यों अचानक गली-कूचे शमशान बन गए ?
आजाद होते ही क्यों भारत और पाकिस्तान बन गए?

आज तीज त्योहारों में जश्न मनाना,
जैसे दिल के टूटे अरमान बन गए!
मासूम चेहरों पर फ़ीकी सी हंसी भी,
अब चंद लम्हों के मेहमान बन गए!

हर गली, हर कसबे में सिसक रही है जिंदगी ,
अपनों से बिछड़ने के गम में बिलख रही है जिंदगी,
बंद कमरे के उदास कोनो में दुबके रहना,
जिंदगी जीने के यही अब नए आयाम बन गए!

Sahitya manjari

Tuesday, February 9, 2010

हाल-ए-दिल...

ये हाल-ए-दिल है उस जानशीन के लिए, जिसे किस रिश्ते के दायरे में रखूं ये मेरी समझ नहीं आता! 

हमने उन्हें चाहा,अपना दिल उनके नाम कर दिया
पर उन्होंने, मेरे ज़ज्बातो का कत्ल-ए-आम कर दिया
दिल टूटा उनकी बेवफाई से, तो छलक आये मेरे आंसू
पर बेहयाई से उन्होंने, उसे भी सरे आम कर दिया!


इजहार-ए-मुहब्बत की जुबान क्या होती है,
ये हाल-ए-दिल लफ्जों में बयां कहाँ होती है,
वो दूर होते हैं तो नस नस बोल उठता है,
उनके आते ही, रूह की ये आवाज फ़ना होती है!


अपने चेहरे के अश्को को छुपाऊँ कैसे,
ज़ालिम, तेरी मर्जी के मुताबिक नज़र आऊँ कैसे!
तू तो तोड़ गया ये दिल बेरहम बनकर,
अब जख्मी दिल पे मरहम लगाऊं कैसे!


वो मुझसे पूछ रहा था की बताओ कैसा लगा,
तुम अगले ज़ख्म की छोड़ो, ये घाव कैसा लगा !
अजब सवाल किया था  आंधियो ने फूलो से,
शाख से टूट कर गिरना, बताओ कैसा लगा!


जब हमने इज़हार किया अपनी मासूम मुहब्बत का,
तो ठुकरा कर उसे, उन्होंने दोस्ती का नाम दे दिया!
जब दर्द-ए-दिल निकला मेरी कलम से स्याही बनकर
तो अनजान बनके,उसे लाजवाब शायरी का नाम दे दिया!

Friday, February 5, 2010

चुनिंदा शायरी ....


  • मैंने चाहा था की वो बेवफा निकले,
    उसे न चाहने का कोई तो सिलसिला निकले...
  • दुश्मन को भी सीने से लगाना न भूले,
    हम अपने बुजुर्गो का जमाना न भूले...

  • अकल पे नाज था पर कब ये सोचा था,
    इश्क के हाथो ये भी होगा की लोग हमें समझायेंगे...
  • नींद ये सोच कर टूटी अक्सर,
    की किस तरह उनकी रातें कटती होंगी...

  • यू ही इस तरह हवा नहीं चलती,
    उसे तो बस हमारा दिया बुझाना था...
  • हमें भी दोस्तों से काम पड़ा यानी,
    उनके बेवफा होने का वक़्त आ गया...

  • किस किस तरह से मुझे रुसवा किया गया,
    मेरे लहू से गैरो का नाम लिखा गया...

  • हम रातो में उठ उठ क जिसके लिए रोते हैं,
    वो गैर की बाहों में चैन की नींद सोते हैं...

  • काटों से गुजर जाना,शोलो से गुजर जाना,
    फूलो की बस्ती में जाना तो संभल के जाना...

  • ऐसे भी है दुनिया में जिन्हें गम नहीं होता,
    एक हम जिसका गम कम नहीं होता...