Friday, February 5, 2010

चुनिंदा शायरी ....


  • मैंने चाहा था की वो बेवफा निकले,
    उसे न चाहने का कोई तो सिलसिला निकले...
  • दुश्मन को भी सीने से लगाना न भूले,
    हम अपने बुजुर्गो का जमाना न भूले...

  • अकल पे नाज था पर कब ये सोचा था,
    इश्क के हाथो ये भी होगा की लोग हमें समझायेंगे...
  • नींद ये सोच कर टूटी अक्सर,
    की किस तरह उनकी रातें कटती होंगी...

  • यू ही इस तरह हवा नहीं चलती,
    उसे तो बस हमारा दिया बुझाना था...
  • हमें भी दोस्तों से काम पड़ा यानी,
    उनके बेवफा होने का वक़्त आ गया...

  • किस किस तरह से मुझे रुसवा किया गया,
    मेरे लहू से गैरो का नाम लिखा गया...

  • हम रातो में उठ उठ क जिसके लिए रोते हैं,
    वो गैर की बाहों में चैन की नींद सोते हैं...

  • काटों से गुजर जाना,शोलो से गुजर जाना,
    फूलो की बस्ती में जाना तो संभल के जाना...

  • ऐसे भी है दुनिया में जिन्हें गम नहीं होता,
    एक हम जिसका गम कम नहीं होता...

No comments:

Post a Comment