ये हाल-ए-दिल है उस जानशीन के लिए, जिसे किस रिश्ते के दायरे में रखूं ये मेरी समझ नहीं आता!
हमने उन्हें चाहा,अपना दिल उनके नाम कर दिया
पर उन्होंने, मेरे ज़ज्बातो का कत्ल-ए-आम कर दिया
दिल टूटा उनकी बेवफाई से, तो छलक आये मेरे आंसू
पर बेहयाई से उन्होंने, उसे भी सरे आम कर दिया!
इजहार-ए-मुहब्बत की जुबान क्या होती है,
ये हाल-ए-दिल लफ्जों में बयां कहाँ होती है,
वो दूर होते हैं तो नस नस बोल उठता है,
उनके आते ही, रूह की ये आवाज फ़ना होती है!
अपने चेहरे के अश्को को छुपाऊँ कैसे,
ज़ालिम, तेरी मर्जी के मुताबिक नज़र आऊँ कैसे!
तू तो तोड़ गया ये दिल बेरहम बनकर,
अब जख्मी दिल पे मरहम लगाऊं कैसे!
वो मुझसे पूछ रहा था की बताओ कैसा लगा,
तुम अगले ज़ख्म की छोड़ो, ये घाव कैसा लगा !
अजब सवाल किया था आंधियो ने फूलो से,
शाख से टूट कर गिरना, बताओ कैसा लगा!
जब हमने इज़हार किया अपनी मासूम मुहब्बत का,
तो ठुकरा कर उसे, उन्होंने दोस्ती का नाम दे दिया!
जब दर्द-ए-दिल निकला मेरी कलम से स्याही बनकर
तो अनजान बनके,उसे लाजवाब शायरी का नाम दे दिया!